छुरिया : शिक्षा के परिदृश्य में अपनी असाधारण प्रतिभा और अपूर्ण लगन की अमिट छाप छोड़े हुए, ग्राम भोलापुर के होनहार बालक प्रियांशु दुबे ने कक्षा दसवीं की बोर्ड परीक्षा में 92.33 प्रतिशत अंक अर्जित कर एक ऐतिहासिक और स्वर्णिम सफलता का परचम लहराया है। बचपन से ही तेज बुद्धि और प्रतिभा के धनी रहे प्रियांशु वर्तमान में राजधानी रायपुर के सड्डू स्थित प्रतिष्ठित 'प्रयास वांछनीय बालक अंग्रेजी माध्यम विद्यालय' में अध्ययनरत हैं, जो कि मेधावी छात्रों को तराशने के लिए पूरे प्रदेश में विख्यात है। अपनी इस शानदार और असाधारण उपलब्धि से प्रियांशु ने न केवल अपने विद्यालय और गुरुजनों का गौरव बढ़ाया है, बल्कि अपने घर ग्राम भोलापुर का नाम भी पूरे अंचल और प्रदेश स्तर पर रोशन कर दिया है। एक छात्र की सफलता के पीछे उसके परिवार के त्याग और संस्कारों की सबसे बड़ी भूमिका होती है, और यह बात प्रियांशु के मामले में पूरी तरह से चरितार्थ होती है। उनके पिता श्री चेतन प्रसाद दुबे, जो स्वयं एक सम्मानित शिक्षक हैं, और उनकी माता श्रीमती मुस्कान दुबे ने अपने पुत्र को हमेशा उच्च विचार और कठोर परिश्रम के संस्कार दिए,
जिसका प्रतिफल आज इस शानदार परीक्षा परिणाम के रूप में पूरे समाज के सामने है। जैसे ही परीक्षा परिणाम की घोषणा हुई और प्रियांशु के 92.33% अंकों की खबर परिजनों तक पहुंची, पूरे घर-परिवार और ग्राम भोलापुर में हर्षोल्लास की लहर दौड़ गई। इस अद्भुत खुशी के ठेकेदार को साझा करते हुए परिवार के सदस्यों, इष्ट मित्रों और एथलीटों ने एक-दूसरे को मिठाइयां खिलाकर अपनी खुशी का इजहार किया और जश्न मनाया। पूरे अंचल के शिक्षकों, शिक्षकों और स्थानीय कर्मचारियों ने प्रियांशु की इस अतुल मेहनत की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हें ढेरों बधाईयां प्रेषित की हैं और यह विश्वास भरोसा है कि प्रियांशु भविष्य में भी इसी प्रकार सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करते हुए अपने अंचल का नाम देश भर में रोशन करेंगे।
भारतीय शिक्षा प्रणाली और किसी भी विद्यार्थी के सैद्धांतिक जीवन में कक्षा दसवीं की बोर्ड परीक्षा को सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव और एक बड़े 'माइलस्टोन' के रूप में देखा जाता है, क्योंकि यहीं से एक छात्र के भविष्य और उसके करियर की वास्तविक आधारशिला रखी जाती है। दसवीं का परिणाम सिर्फ एक अंकसूची नहीं है, बल्कि यह वह निर्णायक मोड़ है जहाँ से विद्यार्थी अपनी वांछनीय और क्षमता के अनुसार कला, विज्ञान या वाणिज्य (Arts, Science, or Commerce) जैसे संकायों का चयन कर अपने जीवन की दिशा तय करता है। यह परीक्षा छात्रों को पहली बार एक वृहद स्तर की प्रतिस्पर्धा का अनुभव कराती है और उन्हें मानसिक रूप से सशक्त बनाती है। लेकिन इसी के साथ, समाज और जुड़ाव के लिए यह विकसित भी अत्यंत आवश्यक है कि यदि किसी छात्र का परीक्षा परिणाम उसके आयामों के अनुरूप नहीं आया है या उसे कम अंक प्राप्त हुए हैं, तो यह उसके जीवन या उसकी प्रतिभा का अंतिम मूल्यांकन बिल्कुल नहीं है। एक कागज का टुकड़ा या एक परीक्षा का अंक किसी भी बच्चे की असीमित क्षमताओं को परिभाषित नहीं कर सकता। इतिहास गवाह है कि दुनिया के कई महान वैज्ञानिक, सफल व्यवसायी और प्रेरक व्यक्तित्व अपनी शुरुआती परीक्षाओं में असफल रहे या उन्होंने बहुत कम अंक प्राप्त किए, लेकिन अपनी गतिविधियों और अपने जुनून के दम पर उन्होंने पूरी दुनिया को बदल कर रख दिया। कम अंक आने पर छात्रों को निराश या निराश होने की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है; बल्कि इसे अपनी कमियों को परिचित और एक नई ऊर्जा के साथ दोहरी मेहनत करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। ऐसे भरोसेमंद और संवेदनशील समय में माता-पिता और अभिभावकों का यह परम कर्तव्य बन जाता है कि वे अपने बच्चों की तुलना किसी अन्य 'टॉपर' से करने के बजाय, उन्हें गले लगाया, उनका मानसिक संबल बढ़ा और उन्हें यह पदनाम दिलाएं कि जीवन में अनगिनत अवसर उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। सफलता केवल अंकों के प्रतिशत में नहीं छिपी है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में अपने सर्वश्रेष्ठ कौशल का प्रदर्शन करने, एक अच्छा इंसान बनने और निरंतर आगे बढ़ते रहने की जिद में निहित है। इसलिए, जो सफल हुए हैं उन्हें अनंत शुभकामनाएं, और जिनके अंक कम आए हैं, उनके लिए यह संदेश है कि आसमान अभी और भी है, अपनी उड़ान की तैयारी बस जारी रखिए।
