दुर्ग : चाचा ही निकला मासूम भतीजी से दुष्कर्म करने वाला, पॉक्सो कोर्ट ने सुनाई फांसी की सजा

दुर्ग, 10 सितंबर 2026। दुर्ग में छह साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के बहुचर्चित मामले में विशेष पॉक्सो कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने बच्ची के सगे चाचा सोमेश यादव (24) को दोषी मानते हुए फांसी की सजा दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह सामान्य अपराध नहीं था, बल्कि भरोसे के रिश्ते का बेहद गंभीर दुरुपयोग था। बच्ची की उम्र, अपराध की गंभीरता, आरोपी का उसके साथ पारिवारिक रिश्ता और वारदात के बाद सबूत मिटाने की कोशिश को देखते हुए अदालत ने मामले को ‘विरलतम से विरलतम’ माना।


कन्याभोज के लिए गई थी बच्ची, फिर नहीं लौटी

मामला 6 अप्रैल 2025 का है। रामनवमी के अवसर पर करीब साढ़े छह साल की बच्ची कन्याभोज में शामिल होने के लिए अपनी बुआ-दादी के घर पहुंची थी। इसी मकान की छत पर बने अधूरे कमरे में उसका चाचा सोमेश यादव कुछ समय से रह रहा था। अदालत के सामने आए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मुताबिक बच्ची आरोपी के बुलाने पर छत की ओर गई थी। बाद में उसकी चप्पल उसी घर से बरामद हुई। कोर्ट ने इस तथ्य को भी घटनाओं की कड़ी का अहम हिस्सा माना।

सबूतों में सबसे मजबूत रहा DNA मैच

दुर्ग पॉक्सो कोर्ट में सुनवाई के दौरान फॉरेंसिक और DNA रिपोर्ट ने मामले की दिशा स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अदालत के अनुसार बच्ची के रक्त का DNA आरोपी से जुड़ी वस्तुओं पर मिले रक्त से मेल खाया। इसके अलावा बच्ची के कपड़ों और मेडिकल जांच से संबंधित नमूनों में मिले मानव वीर्य के DNA का मिलान भी आरोपी के DNA से हुआ। इन वैज्ञानिक साक्ष्यों को अन्य परिस्थितिजन्य प्रमाणों के साथ देखने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आरोपी के खिलाफ साक्ष्यों की कड़ी मजबूत और पूरी है।

कार में बच्ची को छोड़ने के पीछे क्या था मकसद?

अदालत के अनुसार वारदात के बाद बच्ची को एक दूसरे व्यक्ति की कार में रख दिया गया। मेडिकल रिपोर्ट में मिले कुछ शारीरिक संकेतों को डॉक्टरों की राय के साथ देखते हुए कोर्ट ने माना कि बच्ची को कार में रखे जाने के वक्त वह जीवित थी। बंद कार में गर्मी और सदमे की परिस्थितियों के बीच उसकी स्थिति बिगड़ी और उसकी मौत हो गई। अदालत ने इसी आधार पर हत्या का अपराध भी सिद्ध माना।

CCTV नहीं मिला तो भी क्यों दोषी ठहराया?

बचाव पक्ष की ओर से यह सवाल उठाया गया कि बच्ची को घर से कार तक ले जाने का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और CCTV में भी घटना कैद नहीं हुई। लेकिन अदालत ने कहा कि हर आपराधिक मामले में प्रत्यक्षदर्शी होना जरूरी नहीं है। यहां DNA, मेडिकल रिपोर्ट, घटनास्थल से मिले सामान और आरोपी के आचरण समेत कई परिस्थितियां एक-दूसरे से जुड़ती हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए माना कि इन सभी कड़ियों के बाद आरोपी के अपराध को लेकर उचित संदेह बाकी नहीं रहता।

बच्ची को खोजने का नाटक और फिर दूसरे व्यक्ति पर हमला

फैसले में आरोपी के वारदात के बाद के व्यवहार का भी उल्लेख किया गया। कोर्ट के मुताबिक बच्ची को कार में रखे जाने के बाद आरोपी परिवार के साथ उसकी तलाश में शामिल होने का दिखावा करता रहा। जब कार मालिक अनुराग मेश्राम ने बच्ची को देखा और इसकी जानकारी दी, तब आरोपी ने कथित तौर पर उस पर ही संदेह जताते हुए उसके साथ मारपीट की। अदालत ने इस घटनाक्रम को अपराध के बाद साक्ष्य छिपाने और किसी दूसरे व्यक्ति को मामले में फंसाने की कोशिश के तौर पर देखा।

फांसी की सजा के पीछे कोर्ट ने गिनाए गंभीर कारण

दुर्ग की विशेष पॉक्सो अदालत ने मृत्युदंड देने से पहले मामले की परिस्थितियों पर विस्तार से विचार किया। बच्ची की कम उम्र, आरोपी की वयस्क उम्र, चाचा-भतीजी के बीच विश्वास का रिश्ता, रामनवमी के दिन घटना होना, अपराध की गंभीरता और वारदात के बाद सबूतों से छेड़छाड़—इन सभी पहलुओं ने सजा तय करने में अहम भूमिका निभाई। अदालत ने माना कि अपराध की परिस्थितियां इसे विरलतम से विरलतम श्रेणी में रखती हैं।

पॉक्सो में फांसी, हत्या में भी मृत्युदंड

सोमेश यादव को पॉक्सो एक्ट की धारा 6(1) के तहत मृत्युदंड और जुर्माने की सजा दी गई। हत्या के मामले में BNS की धारा 103(1) के तहत भी फांसी और जुर्माना लगाया गया। वहीं साक्ष्य छिपाने से जुड़े अपराध में BNS की धारा 238(क) के तहत पांच वर्ष का सश्रम कारावास और जुर्माना सुनाया गया। अदालत ने संबंधित प्रावधानों के बीच दंड की स्थिति को देखते हुए पॉक्सो कानून के तहत सजा को प्रभावी माना।

परिवार को 7 लाख रुपये की प्रतिकर राशि

कोर्ट ने बच्ची के परिजनों को राज्य की पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत 7 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है। पहले मिली किसी अंतरिम सहायता को इस राशि में समायोजित किया जाएगा। जुर्माने की रकम भी नियमानुसार परिवार को क्षतिपूर्ति के तौर पर दिए जाने का प्रावधान किया गया है।

अभी फांसी नहीं होगी, हाईकोर्ट की पुष्टि बाकी

विशेष पॉक्सो कोर्ट से मृत्युदंड सुनाए जाने के बावजूद सजा का तत्काल अमल नहीं होगा। कानून के अनुसार फांसी की सजा की पुष्टि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से होना जरूरी है। इसी प्रक्रिया के लिए अदालत ने केस को हाईकोर्ट भेजने का आदेश दिया है। सोमेश यादव 8 अप्रैल 2025 से न्यायिक हिरासत में है।

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