ब्रेकिंग: ग्राम वासियों को अंधेरे में रखकर कोटवार ने किया 9 एकड़ जमीन अपने नाम

 छुरिया टाइम्स:– छुरिया क्षेत्र के ग्राम कल्लूटोला में शासकीय/पड़त भूमि को लेकर गंभीर अनियमितता का मामला सामने आया है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि गांव के कोटवार ने लगभग 9 एकड़ भूमि को सुनियोजित तरीके से अपने नाम कराने का प्रयास किया, जिसमें राजस्व तंत्र के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध प्रतीत हो रही है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पटवारी हल्का नंबर 10 के अंतर्गत आने वाले खसरा क्रमांक 12/2 (1.594 हेक्टेयर) एवं खसरा नंबर 17 (2.136 हेक्टेयर) की भूमि को पंचनामा प्रक्रिया के माध्यम से कथित रूप से गलत तरीके से दर्ज कराया गया। आरोप है कि कोटवार नूरसिंग ने ग्रामीणों को यह कहकर गुमराह किया कि भूमि शांति बाई के नाम पंजीकृत करनी है, और इसी आधार पर 9 लोगों से दस्तावेजों में हस्ताक्षर करवा लिए।

हस्ताक्षर करने वालों में हिरासिंग, महेश, गन्नूराम, राजकुमार, हौसीलाल, टाहलु, चुनुराम, महासिंग, खेमूराम सहित स्वयं कोटवार नुरसिंग का नाम भी सामने आया है।

भूमि का इतिहास और वर्तमान स्थिति

ग्रामीणों के अनुसार, खसरा नंबर 17 यह भूमि पूर्व में घास भूमि और पड़त था जो 100 साल से भी ज्यादा हो गया है खसरा नंबर 12/2 कोटवारी सेवा के एवज में 1993-94 में आवेदक के बड़े पिता अंकालू (आत्मज बिसाली) को प्राप्त हुई थी। जो कि हमेशा से पडत रहा बाद में उन्होंने इसे चारागाह के रूप में छोड़ते हुए शासन को वापस कर दिया था। वर्तमान में यह भूमि राजस्व अभिलेखों में शासकीय, रिक्त एवं पड़त दर्ज है, जिस पर किसी भी व्यक्ति का वैध स्वामित्व या अतिक्रमण नहीं है।

पटवारी और तहसील स्तर पर मिलीभगत की आशंका

इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि बिना राजस्व अधिकारियों की जानकारी और अनुमति के इस प्रकार का पंचनामा एवं नामांतरण संभव कैसे हुआ?

पटवारी की भूमिका: खसरा रिकॉर्ड, नक्शा और भूमि प्रविष्टि का प्रत्यक्ष नियंत्रण पटवारी के पास होता है। यदि भूमि शासकीय दर्ज थी, तो बिना सत्यापन किसी व्यक्ति के पक्ष में दस्तावेज तैयार होना गंभीर लापरवाही या मिलीभगत की ओर संकेत करता है।

तहसीलदार स्तर की जिम्मेदारी: नामांतरण (म्यूटेशन) जैसी प्रक्रियाओं में तहसीलदार की स्वीकृति आवश्यक होती है। यदि इस मामले में दस्तावेज आगे बढ़े हैं, तो यह प्रशासनिक निगरानी की कमी या जानबूझकर की गई अनदेखी को दर्शाता है।

पंचनामा प्रक्रिया पर सवाल: ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें वास्तविक स्थिति बताए बिना हस्ताक्षर करवाए गए, जिससे पंचनामा की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है।

ग्रामीणों में आक्रोश, निष्पक्ष जांच की मांग:– मामले के उजागर होने के बाद गांव में आक्रोश का माहौल है। ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से जिला प्रशासन से मांग की है कि— पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच कराई जाए दोषी पाए जाने पर संबंधित कोटवार, पटवारी एवं अन्य अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई की जाए शासकीय भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए

निष्कर्ष:– यदि आरोप सत्य सिद्ध होते हैं, तो यह केवल एक गांव का मामला नहीं, बल्कि राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। शासकीय भूमि के संरक्षण और ग्रामीणों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रशासन को इस मामले में त्वरित और सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है।

Monesh Kumar editor & reporter in chief 

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